महात्मा गांधी की पूरी कहानी
एजेंसी (अब गुजरात)मे हुआ ।
इन हो ने कई कार्य/उपलब्धियां हासिल की स्वतंत्रता आन्दोलन में सबसे
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
महात्मा गांधी के नाम से मशहूर मोहनदास करमचंद
गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख
राजनैतिक नेता थे। सत्याग्रह और अहिंसा के
सिद्धान्तो पर चलकर उन्होंने भारत को आजादी
दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके इन
सिद्धांतों ने पूरी दुनिया में लोगों को नागरिक
अधिकारों एवं स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिये
प्रेरित किया। उन्हें भारत का राष्ट्रपिता भी
कहा जाता है। सुभाष चन्द्र बोस ने वर्ष 1944 में
रंगून रेडियो से गान्धी जी के नाम जारी प्रसारण
में उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ कहकर सम्बोधित किया था।
महात्मा गाँधी समुच्च मानव जाति के लिए
मिशाल हैं। इनके पिता का नाम करमचन्द गान्धी
था जो कि ब्रिटिश राज के समय काठियावाड़ की एक
छोटी सी रियासत (पोरबंदर) के दीवान थे।इनकी माता का नाम पुतलीबाई परनामी था वह वैश्य
समुदाय से ताल्लुक रखती थीं ।
सन 1883 में साढे 13 साल की उम्र में ही उनका
विवाह 14 साल की कस्तूरबा से करा दिया
गया। जब मोहनदास 15 वर्ष के थे तब इनकी पहली
सन्तान ने जन्म लिया लेकिन वह केवल कुछ दिन ही
जीवित रही। उनके पिता करमचन्द गाँधी भी
इसी साल (1885) में चल बसे। बाद में मोहनदास
और कस्तूरबा के चार सन्तान हुईं – हरीलाल
गान्धी , मणिलाल गान्धी ,
रामदास गान्धी और देवदास गांधी
वह अच्छे विद्यार्थी भी थे।सन
1887 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अहमदाबाद
से उत्तीर्ण की। इसके बाद मोहनदास ने भावनगर
के शामलदास कॉलेज में दाखिला लिया पर
ख़राब स्वास्थ्य और गृह वियोग के कारण वह
अप्रसन्न ही रहे और कॉलेज छोड़कर पोरबंदर वापस
चले गए।
गाँधी 24 साल की उम्र में दक्षिण अफ्रीका
पहुंचे। वह प्रिटोरिया स्थित कुछ भारतीय
व्यापारियों के न्यायिक सलाहकार के तौर पर
वहां गए थे। उन्होंने अपने जीवन के 21 साल
दक्षिण अफ्रीका में बिताये जहाँ उनके राजनैतिक
विचार और नेतृत्व कौशल का विकास हुआ।
वर्ष 1914 में गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत
वापस लौट आये।
सन 1918 में गुजरात स्थित खेड़ा बाढ़ और सूखे की
चपेट में आ गया था जिसके कारण किसान और
गरीबों की स्थिति बद्तर हो गयी और लोग कर
माफ़ी की मांग करने लगे। खेड़ा में गाँधी जी के
मार्गदर्शन में सरदार पटेल ने अंग्रेजों के साथ इस
समस्या पर विचार विमर्श के लिए किसानों का
नेतृत्व किया। इसके बाद अंग्रेजों ने राजस्व संग्रहण
से मुक्ति देकर सभी कैदियों को रिहा कर दिया।
इस प्रकार चंपारण और खेड़ा के बाद गांधी की
ख्याति देश भर में फैल गई और वह स्वतंत्रता
आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण नेता बनकर उभरे।
इसके बाद गाँधी न सिर्फ
कांग्रेस बल्कि देश के एकमात्र ऐसे नेता बन गए
जिसका प्रभाव विभिन्न समुदायों के लोगों पर
था।
गाँधी ने असहयोग आन्दोलन ,हरिजन आंदोलन चलाये ।
फिर उन्होंने सबसे बड़ा ‘भारत छोड़ो
आन्दोलन’ चलाया ।
‘भारत छोड़ो’ स्वतंत्रता आन्दोलन के संघर्ष का
सर्वाधिक शक्तिशाली आंदोलन बन गया इस संघर्ष में
हजारों की संख्या में स्वतंत्रता सेनानी या तो
मारे गए या घायल हो गए और हजारों गिरफ्तार
भी कर लिए गए। गांधी जी ने यह स्पष्ट कर दिया
था कि वह ब्रिटिश युद्ध प्रयासों को समर्थन तब
तक नहीं देंगे जब तक भारत को तत्काल आजादी न
दे दी जाए। उन्होंने यह भी कह दिया था कि
व्यक्तिगत हिंसा के बावजूद यह आन्दोलन बन्द
नहीं होगा। उनका मानना था की देश में व्याप्त
सरकारी अराजकता असली अराजकता से भी
खतरनाक है। गाँधी जी ने सभी कांग्रेसियों और
भारतीयों को अहिंसा के साथ करो या मरो के साथ अनुशासन बनाए रखने को कहा।
जैसा कि सबको अनुमान था अंग्रेजी सरकार ने
गांधी जी और कांग्रेस कार्यकारणी समिति के
सभी सदस्यों को मुबंई में 9 अगस्त 1942 को
गिरफ्तार कर लिया और गांधी जी को पुणे के
आंगा खां महल ले जाया गया जहाँ उन्हें दो साल
तक बंदी बनाकर रखा गया। इसी दौरान उनकी
पत्नी कस्तूरबा गांधी का देहांत बाद 22 फरवरी
1944 को हो गया और कुछ समय बाद गांधी जी
भी मलेरिया से पीड़ित हो गए। अंग्रेज़ उन्हें इस
हालत में जेल में नहीं छोड़ सकते थे इसलिए जरूरी
उपचार के लिए 6 मई 1944 को उन्हें रिहा कर
दिया गया। आशिंक सफलता के बावजूद भारत
छोड़ो आंदोलन ने भारत को संगठित कर दिया
और द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक ब्रिटिश
सरकार ने स्पष्ट संकेत दे दिया था की जल्द ही
सत्ता भारतीयों के हाँथ सौंप दी जाएगी। गांधी
जी ने भारत छोड़ो आंदोलन समाप्त कर दिया
और सरकार ने लगभग 1 लाख राजनैतिक कैदियों
को रिहा कर
विश्व
युद्ध के समाप्त होते-होते ब्रिटिश सरकार ने देश
को आज़ाद करने का संकेत दे दिया था। भारत की
आजादी के आन्दोलन के साथ-साथ, जिन्ना के
नेतृत्व में एक ‘अलग मुसलमान बाहुल्य
देश’ (पाकिस्तान) की भी मांग तीव्र हो गयी
थी और 40 के दशक में इन ताकतों ने एक अलग
राष्ट्र ‘पाकिस्तान’ की मांग को वास्तविकता
में बदल दिया था। गाँधी जी देश का बंटवारा
नहीं चाहते थे क्योंकि यह उनके धार्मिक एकता के
सिद्धांत से बिलकुल अलग था पर ऐसा हो न
पाया और अंग्रेजों ने देश को दो टुकड़ों – भारत
और पाकिस्तान – में विभाजित कर दिया।और हमारा देश आजाद हो गया
अंत मे 30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी
की दिल्ली के ‘बिरला हाउस’ में शाम 5:17 पर
हत्या कर दी गयी। गाँधी जी एक प्रार्थना सभा
को संबोधित करने जा रहे थे जब उनके हत्यारे
नाथूराम गोडसे ने उबके सीने में 3 गोलियां दाग
दी। ऐसे माना जाता है की ‘हे राम’ उनके मुख से
निकले अंतिम शब्द थे। नाथूराम गोडसे और उसके
सहयोगी पर मुकदमा चलाया गया और 1949 में
उन्हें मौत की सजा सुनाई गयी। आज भी इस सत्यवादी नेता को लोग याद करते है

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